नई दिल्ली। समुद्र जितना गहरा और विशाल है, उतनी ही कठिन होती है उस पर चलने वाले जहाजों की दुनिया। लंबे समय तक इसे सिर्फ पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था, लेकिन भारत की बेटी सोनाली बनर्जी ने इस धारणा को तोड़ते हुए इतिहास रच दिया। वह न सिर्फ समुद्र की लहरों पर उतरीं बल्कि यह भी साबित किया कि महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकती हैं।
सोनाली बनर्जी की प्रेरणादायी कहानी
सोनाली बनर्जी का जीवन सिर्फ उनके लिए नहीं बल्कि हर उस लड़की के लिए प्रेरणा है, जो सपनों को हकीकत बनाना चाहती है। उनका जीवन बताता है कि “लहरों से डरकर नाव कभी पार नहीं होती।” सोनाली भारत की पहली महिला मरीन इंजीनियर हैं। उन्होंने न सिर्फ एक कठिन पेशे में प्रवेश किया बल्कि पुरुष-प्रधान क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और साहस से अपनी पहचान बनाई।
इलाहाबाद की बेटी का सपना
सोनाली बनर्जी का जन्म इलाहाबाद में हुआ था। बचपन से ही वह समुद्र और जहाजों की कहानियों से आकर्षित थीं। उनके चाचा नौसेना में कार्यरत थे, जिनकी कहानियां सुनकर उन्होंने मन में तय कर लिया था कि उनका करियर समुद्र और जहाजों से जुड़ा होगा।
शिक्षा और चुनौतियों से भरा सफर
साल 1995 में सोनाली ने कोलकाता के तरातला स्थित मरीन इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (MERI) की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की। यह संस्थान भारत में मरीन इंजीनियरिंग का प्रमुख केंद्र था। उस समय इस कॉलेज में किसी महिला का दाखिला पहली बार हुआ था। यह आसान नहीं था। न महिला छात्रावास था, न कोई महिला कर्मचारी। अकेली सोनाली के लिए आवास की समस्या बड़ी चुनौती थी। अंततः कॉलेज प्रशासन ने उन्हें शिक्षकों के लिए बने खाली क्वार्टर में रहने की अनुमति दी। उनके बैच में कुल 1500 कैडेट्स थे और वह उनमें एकमात्र महिला थीं। पुरुष-प्रधान माहौल में अपनी पहचान बनाने के लिए सोनाली ने दोगुनी मेहनत की। हर सेमेस्टर में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और 1999 में बी.ई. डिग्री पूरी की।
शिपिंग कंपनी में पहली ट्रेनिंग
शुरुआत में किसी भी शिपिंग कंपनी ने उन्हें प्रशिक्षु (ट्रेनिंग) के लिए स्वीकार नहीं किया। लेकिन सोनाली ने हार नहीं मानी। अंततः मोबिल शिपिंग कंपनी ने उन्हें छह महीने की प्री-सी ट्रेनिंग का मौका दिया। ट्रेनिंग के दौरान सोनाली ने श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, थाईलैंड, हॉन्ग कॉन्ग, फिजी और खाड़ी देशों के बंदरगाहों पर काम किया। यह सफर उनके लिए सीख और संघर्ष से भरा हुआ था।
22 साल की उम्र में रचा इतिहास
उत्तर प्रदेश की इस बेटी ने महज 22 साल की उम्र में सामाजिक और पेशेवर बाधाओं को तोड़कर 27 अगस्त 1999 को भारत की पहली महिला मरीन इंजीनियर बनने का गौरव हासिल किया। इसके बाद 26 अगस्त 2001 को उन्होंने मोबिल शिपिंग कंपनी के जहाज के मशीन रूम की जिम्मेदारी संभालकर एक और मील का पत्थर हासिल किया।
रूढ़ियों को तोड़ा, नई राह दिखाई
सोनाली की यह उपलब्धि महिला सशक्तिकरण की बड़ी मिसाल है। उन्होंने साबित कर दिया कि कोई भी पेशा महिलाओं के लिए कठिन नहीं है। साहस, मेहनत और लगन के साथ महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी जगह बना सकती हैं।
आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा
सोनाली बनर्जी की यह यात्रा हर युवा लड़की को यह संदेश देती है कि चुनौतियां चाहे जितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो मंजिल जरूर मिलती है। उनकी कहानी समाज में प्रचलित इस सोच को बदलती है कि तकनीकी और समुद्री क्षेत्र सिर्फ पुरुषों के लिए हैं।