क्या आप भी उन लोगों में हैं जिन्होंने एक दौर में ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ देखा और अब ‘अनुपमा’ से खुद को जोड़ते हैं? अगर हाँ, तो आप समझ सकते हैं कि हाल ही में जब इन दोनों किरदारों की तुलना शुरू हुई, तो ये सिर्फ टीवी शोज़ की बात नहीं रही — ये दो पीढ़ियों की सोच की टक्कर बन गई।
‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में तुलसी विरानी हर घर की परंपरा की मूरत थी त्याग, सहनशीलता और परिवार की मर्यादा की प्रतीक। उन्होंने परिवार को जोड़ने के लिए हर संभव बलिदान दिया। वो उस ज़माने की “आदर्श बहू” थीं, जिसे देखकर हमारी माएं और दादियां चैन की सांस लेती थीं। वहीं अनुपमा की कहानी उस स्त्री की है, जो सालों तक दूसरों के लिए जीती रही बिना कोई सवाल किए और अब जब सवाल उठाना सीखा है, तो पूरे समाज को आइना दिखा रही है।
जब इन दो धारावाहिकों की तुलना हुई, तो निर्माता एकता कपूर ने साफ कहा कि ये तुलना ठीक नहीं है। तुलसी और अनुपमा की ज़िंदगी, हालात और सोच अलग हैं। ये दो अलग युगों की कहानियाँ हैं। वहीं, अनुपमा का किरदार निभा रही रुपाली गांगुली ने भी कहा कि वो तुलसी जैसे किरदार से तुलना नहीं करना चाहतीं क्योंकि ‘क्योंकि’ अपनी जगह एक इतिहास है।
सोशल मीडिया पर जब तुलसी और अनुपमा की एक साथ स्क्रीन पर झलक दिखी, तो फैंस भावुक हो गए। किसी ने कहा “माँ-बेटी जैसी लगती हैं दोनों”, तो किसी ने लिखा “अब असली मुकाबला शुरू होगा”। लेकिन क्या वाकई ये मुकाबला है? शायद नहीं। ये तो एक सिलसिला है उस भारतीय स्त्री की यात्रा का, जो कभी घर की चारदीवारी में खामोश थी, और आज अपने लिए बोलना सीख गई है।
अगर तुलसी हमें ये सिखाती थीं कि परिवार को कैसे जोड़े रखें, तो अनुपमा ये सिखा रही हैं कि अपने लिए खड़ा होना भी जरूरी है। दोनों का संघर्ष अलग था, लेकिन मर्म एक ही औरत सिर्फ दूसरों के लिए नहीं जीती, उसकी अपनी भी एक दुनिया होती है। इन किरदारों को देखकर तुलना करने का मन होता है, लेकिन जब दिल से सोचते हैं, तो महसूस होता है ये तुलना नहीं, प्रेरणा है। एक पीढ़ी ने दिखाया कि कैसे निभाना है, और दूसरी बता रही है कि कैसे जीना है। तो आप किससे खुद को ज़्यादा जोड़ते हैं? तुलसी से, जो अपने परिवार के लिए जीती रही, या अनुपमा से, जो अब खुद के लिए जी रही है? शायद आप दोनों की थोड़ी-थोड़ी सी हैं।
