Legal Rights: शादी एक अटूट बंधन है, जो समाज में लोगों को और परिवार को आपस में बांध कर रखती है। बहुत से लोग शादीशुदा जिंदगी को सफल तरीके से जीने में कामयाब हो जाते हैं, तो वहीं बहुत से लोगों के लिए यह एक खौफनाक और कठिन परिस्थिति बनकर रह जाती है। ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जिनमें महिलाएं सालों तक अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को सहती रहती हैं, क्योंकि उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी नहीं होती है।
ऐसे में हम आपको इंडियन लीगल राइट्स या उन अधिकारों के बारे में बताएंगे, जो सभी शादीशुदा महिलाओं के हित को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं और जिनके बारे में सभी को जरूर पता होना चाहिए।
अबॉर्शन का अधिकार
हर एक महिला के पास अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को गिराने का अधिकार होता है। इसके लिए उसे अपने ससुराल या अपने पति की सहमति की जरूरत नहीं होती है। The Medical Termination of Pregnancy Act, 1971, के अंतर्गत एक महिला अपनी प्रेगनेंसी को किसी भी समय खत्म कर सकती है, इसके लिए प्रेगनेंसी का 24 सप्ताह से कम का होना जरूरी है।
मैट्रिमोनियल होम या पति के घर में रहने का अधिकार
एक पत्नी को मैट्रिमोनियल होम या अपने पति के घर में रहने का पूरा अधिकार होता है। चाहे परिस्थिति किसी भी तरह की हो, चाहे उनके पति की मृत्यु ही क्यों ना हो गई हो, फिर भी एक पत्नी अपने ससुराल में रह सकती है। और अगर बात तलाक तक पहुंच चुकी है, तब भी एक पत्नी अपने पति के घर में तब तक रह सकती है जब तक कि उसे रहने के लिए कोई उचित जगह न मिल जाए। यह उसके लीगल हक़ में है।
तलाक का अधिकार
हिंदू मैरिज एक्ट के अंतर्गत एक महिला अपने पति की सहमति के बिना भी उस स्थिति में तलाक लेने का अधिकार रखती है, जब उसके साथ पति ने बेवफाई की हो, या उस महिला के साथ शारीरिक और मानसिक अत्याचार या कोई जबरदस्ती आदि किया हो। इसके साथ ही महिला अपने पति से मेंटेनेंस चार्ज की मांग कर सकती है। ‘इंडियन पेनल कोड’ सेक्शन 125, के तहत एक पत्नी अपने और अपने बच्चे के लिए अपने पति से फाइनैंशल मेंटेनेंस की मांग कर सकती है, खासतौर से तब, जब उसका पति ज्यादा कमाता हो।
बच्चे की कस्टडी का अधिकार
एक महिला के पास इस बात का पूरी तरह से अधिकार होता है कि वह अपने बच्चे की कस्टडी की मांग कर सके। खासतौर पर tab jab बच्चा 5 साल से छोटा हो। साथ ही अगर वह अपना ससुराल छोड़ कर जा रही है, ऐसी परिस्थिति में भी वह बिना किसी कानूनी ऑर्डर के अपने बच्चे को अपने साथ ले जा सकती है।
घरेलु हिंसा के खिलाफ रिपोर्ट करने का अधिकार

Domestic Violence Act 2005 के तहत, एक महिला को यह अधिकार प्राप्त है कि अगर उसके साथ उसका पति या उसके ससुराल वाले शारीरिक, मानसिक, सेक्सुअल या आर्थिक रूप से अत्याचार या शोषण करते हैं तो वह उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कर सकती है।
स्त्रीधन का अधिकार
Hindu Marriage act 1955 के तहत, एक महिला स्त्रीधन को अधिकारपूर्वक और मालिकाना हक के साथ पूण रूप से मांग कर सकती है। अगर उसके इस अधिकार का एब्यूज होता है, तो ऐसी परिस्थिति में वह, The protection of Women Against Domestic Violence Act में सेक्शन 19 A, के तहत शिकायत दर्ज कर सकती है।
दहेज़ और उत्पीड़न के खिलाफ रिपोर्ट करने का अधिकार

एक महिला को यह अधिकार प्राप्त है कि अगर उसका मायके पक्ष का परिवार या उसके ससुराल के लोगों के बीच किसी भी तरह के दहेज का लेन-देन होता है, तो वह इसकी शिकायत कर सकती है। IPC के Section 304B और 498A, के तहत दहेज का आदान-प्रदान और इससे जुड़े उत्पीड़न को गैर कानूनी और अपराधिक करार दिया गया है।
संपत्ति का अधिकार
The Hindu Succession Act, 1956 में 2005 में हुए संशोधन, के बाद एक बेटी चाहे वह मैरिड हो या ना हो, अपने पिता की प्रॉपर्टी पाने का बराबरी रूप से हक रखती है। इसके साथ ही महिला अपने पति की संपत्ति पर अपना अधिकार जता सकती है। हालांकि, ये केवल उस स्थिति में संभव है, जब उसके पति ने उसे अपनी संपत्ति से बेदखल करने के लिए वसीयत न बनाई हो।
