रजोनिवृत्ति महिलाओं के जीवन का एक स्वाभाविक चरण है, लेकिन इसके साथ जुड़ी स्वास्थ्य चुनौतियाँ कई बार गंभीर रूप ले लेती हैं। इन्हीं में से एक है ऑस्टियोपोरोसिस, यानी हड्डियों का कमजोर होना। यह समस्या धीरे-धीरे शरीर को भीतर से खोखला कर देती है और अक्सर तब सामने आती है, जब महिला को दर्द, चलने में कठिनाई या अचानक फ्रैक्चर का सामना करना पड़ता है। आज लाखों महिलाएँ रजोनिवृत्ति के बाद इस “साइलेंट बीमारी” से जूझ रही हैं, जो उनकी दिनचर्या और आत्मनिर्भरता दोनों को प्रभावित करती है।
अब तक आम धारणा यही रही है कि हड्डियों की कमजोरी केवल कैल्शियम या विटामिन-डी की कमी के कारण होती है। हालांकि हालिया चिकित्सा शोध इस सोच से आगे बढ़कर बीमारी की जड़ तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं। नए निष्कर्ष बताते हैं कि ऑस्टियोपोरोसिस केवल पोषक तत्वों की कमी नहीं, बल्कि शरीर के भीतर आंत, प्रतिरक्षा तंत्र और हड्डियों के बीच बिगड़े संतुलन का नतीजा है।
बीमारी की असली वजह को समझना ज़रूरी
रजोनिवृत्ति के बाद शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिनका असर सिर्फ़ प्रजनन तंत्र तक सीमित नहीं रहता। यह बदलाव आंतों में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया और प्रतिरक्षा प्रणाली को भी प्रभावित करते हैं। जब आंतों का संतुलन बिगड़ता है, तो शरीर में सूजन बढ़ने लगती है। यही सूजन हड्डियों को गलाने वाली कोशिकाओं को ज़्यादा सक्रिय कर देती है, जिससे हड्डियों की घनता तेजी से कम होने लगती है।
इस प्रक्रिया में हड्डियाँ बाहर से सामान्य दिख सकती हैं, लेकिन अंदर से वे कमज़ोर हो चुकी होती हैं। यही वजह है कि कई महिलाओं में मामूली गिरावट या हल्का सा झटका भी गंभीर फ्रैक्चर का कारण बन जाता है।
प्रोबायोटिक थेरेपी से नई उम्मीद
नए शोध में इस जटिल समस्या से निपटने के लिए प्रोबायोटिक थेरेपी की भूमिका पर ध्यान दिया गया है। शोध के दौरान एक सुरक्षित प्रोबायोटिक बैक्टीरिया का प्रयोग किया गया, जिससे आंतों की सूजन में कमी और हड्डियों की मजबूती में सुधार देखा गया। इस प्रोबायोटिक के प्रभाव से आंतों में ऐसे तत्वों का स्तर बढ़ा, जो सूजन को नियंत्रित करने और हड्डियों के क्षरण को धीमा करने में मदद करते हैं।

इस बारे में डॉ. जे. बी. शर्मा, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ का कहना है कि ऑस्टियोपोरोसिस रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में एक ऐसी बीमारी है, जो लंबे समय तक बिना लक्षण के बढ़ती रहती है। अक्सर फ्रैक्चर होने के बाद ही इसका पता चलता है, जब काफी नुकसान हो चुका होता है। यदि इलाज में आंत और प्रतिरक्षा तंत्र को लक्ष्य बनाया जाए, तो यह बीमारी के उपचार में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
आंत और हड्डियों का गहरा संबंध

शोध यह भी दर्शाता है कि आंतों में बनने वाले कुछ तत्व, विशेष रूप से शॉर्ट चेन फैटी एसिड, सूजन को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। जब इनका स्तर संतुलित रहता है, तो हड्डियों के क्षरण की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
डॉ. रुपेश श्रीवास्तव, बायोटेक्नोलॉजी विशेषज्ञ के अनुसार, पोस्ट-मेनोपॉजल ऑस्टियोपोरोसिस केवल कैल्शियम की कमी से होने वाली बीमारी नहीं है। आंत, प्रतिरक्षा तंत्र और हड्डियों के बीच संतुलन बिगड़ने से यह समस्या जन्म लेती है। शोध में मिले सकारात्मक परिणाम भविष्य में एक लक्षित दवा के विकास की मजबूत नींव तैयार कर सकते हैं।

इलाज के तरीकों में संभावित बदलाव
अब तक ऑस्टियोपोरोसिस के इलाज में कैल्शियम, विटामिन-डी सप्लीमेंट और दर्द निवारक दवाओं पर ज़ोर दिया जाता रहा है। हालांकि यह नया शोध इलाज की दिशा को पूरी तरह बदल सकता है। आंत, प्रतिरक्षा तंत्र और हड्डियों के बीच संतुलन को सुधारने पर आधारित यह दृष्टिकोण बीमारी के मूल कारण को लक्ष्य बनाता है, न कि सिर्फ़ उसके लक्षणों को।
शोध में मिले शुरुआती सकारात्मक संकेतों के बाद भविष्य में मानव स्तर पर परीक्षण और नए उपचार विकल्प विकसित किए जाने की संभावना है, जिससे महिलाओं को अधिक प्रभावी और दीर्घकालिक राहत मिल सकती है।
क्यों ज़रूरी है समय पर जागरूकता?
ऑस्टियोपोरोसिस को अक्सर “खामोश बीमारी” कहा जाता है, क्योंकि इसके लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं। जब तक महिला को समस्या का अहसास होता है, तब तक हड्डियों को काफी नुकसान पहुँच चुका होता है। ऐसे में रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं के लिए यह ज़रूरी हो जाता है कि वे अपनी हड्डियों की सेहत को प्राथमिकता दें।
संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, हल्का व्यायाम, धूप में समय बिताना और समय-समय पर जांच कराना हड्डियों को मज़बूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
