कला का कोई उम्र नही होती और सफलता का कोई समय निश्चित नही होता है। यह आपको कब मिल जाये कोई भरोसा नही। ऐसा ही एक जीता जागता उदाहरण है मध्य प्रदेश के उमरिया जिले की रहने वाली जोधइया बाई। उनकी प्रतिभा और सफलता ने उम्र की बाधाएं तोड़ दी।
मजदूरी से पेंटिंग तक का सफर
जोधैया ने अपने जीवन के अधिकांश समय एक मजदूर के रूप में काम किया लेकिन इसके वर्षों बाद उन्हें अपने पेंटिंग के प्रति प्यार का एहसास हुआ। उनकी कला में आदिवासी परंपराओं में निहित ग्रामीण जीवन, प्रकृति और सांस्कृतिक विरासत साफ झलकती है। देखा जाए तो एक अज्ञात गांव से अंतरराष्ट्रीय कला मंच तक की उनकी यात्रा अविस्मरणीय है।
2024 में मिला पद्म श्री पुरस्कार
जोधइया बाई (Jodhaiya Bai) की पेंटिंग्स को विश्व स्तर पर प्रदर्शित किया गया है,जिसके चलते उन्हें पहचान और प्रशंसा मिली है। आपको बता दें कि आदिवासी कला और संस्कृति में उनके अपार योगदान को देखते हुए उन्हें साल 2024 में भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार पद्म श्री पुरस्कार (Padma Shri Award) से सम्मानित किया गया।
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जोधईया बाई को पेटिंग का ख्याल उनके पति के निधन के बाद आया। आज वो देश-दुनिया में काफी चर्चित है और उनकी कहानी इस बात की प्रेरक है कि प्रतिभा की कोई उम्र नही होती और यग किसी भी परिस्थिति में कैसे चमक जायेगी आप इसकी कल्पना नही कर सकते है।
इटली में हुई जोधैया बाई की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी
अपने चित्रकारी से जोधैया बाई ने सिर्फ भारत बल्कि विश्व भर में अपना नाम कर लिया। उनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी मध्य प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश के कई शहरों में लगी। इतना ही नहीं वर्ष 2019 में इटली में उनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगी। और फिर साल 2022 में उनके इस हुनर की सराहना करते हुए भारत के पूर्व प्रधानमंत्री रामनाथ कोविंद ने जोधैया बाई को नारी शक्ति पुरस्कार (Nari Shakti Award) से सम्मानित किया।