आज का समाज तेज़ी से बदल रहा है। बदलते सामाजिक ढाँचे में सिंगल पैरेंटिंग की अवधारणा भी धीरे-धीरे सामने आ रही है। सिंगल पैरेंटिंग का अर्थ है वह स्थिति, जहाँ किसी कारणवश बच्चे की परवरिश की पूरी ज़िम्मेदारी केवल एक माता या पिता पर होती है। विशेष रूप से जब कोई महिला सिंगल मदर के रूप में अपने बच्चे की परवरिश करती है, तो उसे अनेक सामाजिक, आर्थिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
सबसे पहली और बड़ी चुनौती आर्थिक जिम्मेदारी की होती है। एकल माँ को घर का खर्च, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रहन-सहन और भविष्य की सुरक्षा – सब कुछ अकेले संभालना पड़ता है। कई बार सीमित आय में बढ़ती महँगाई के साथ तालमेल बैठाना बेहद कठिन हो जाता है। नौकरी करने वाली महिलाओं को करियर और पैरेंटिंग के बीच संतुलन बनाना पड़ता है, जबकि गैर-कार्यरत महिलाओं के लिए आर्थिक निर्भरता एक गंभीर समस्या बन जाती है।

दूसरी महत्वपूर्ण चुनौती मानसिक और भावनात्मक दबाव है। सिंगल मदर को अकेले निर्णय लेने होते हैं, चाहे वह बच्चे की पढ़ाई से जुड़ा हो या जीवन के किसी अन्य महत्वपूर्ण पहलू से। भावनात्मक सहयोग की कमी कई बार तनाव, चिंता और अवसाद का कारण बन जाती है। समाज की अपेक्षाएँ और बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता महिलाओं पर मानसिक बोझ बढ़ा देती है।
तीसरी बड़ी चुनौती समाज का नज़रिया है। आज भी हमारे समाज में सिंगल मदर्स को संदेह और आलोचना की दृष्टि से देखा जाता है। उन्हें बार-बार अपने फैसलों को सही साबित करना पड़ता है। तलाकशुदा, विधवा या अविवाहित माँ होने पर समाज द्वारा लगाए गए सवाल आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाते हैं। सामाजिक समर्थन की कमी महिलाओं को और अधिक अकेला महसूस कराती है।
बच्चों की परवरिश भी सिंगल मदर के लिए एक बड़ी चुनौती है। बच्चे के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास की पूरी जिम्मेदारी माँ पर होती है। पिता की अनुपस्थिति में बच्चे के सवालों का जवाब देना, उन्हें भावनात्मक सुरक्षा देना और सही दिशा में मार्गदर्शन करना आसान नहीं होता। कई बार माँ को माँ और पिता – दोनों की भूमिका निभानी पड़ती है।

समय प्रबंधन भी एक गंभीर समस्या है। नौकरी, घर के काम और बच्चों के लिए समय निकालना सिंगल मदर के लिए अत्यंत कठिन होता है। स्वयं के लिए समय निकालना लगभग असंभव हो जाता है, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
इसके अतिरिक्त सुरक्षा और भविष्य की चिंता भी हमेशा बनी रहती है। बच्चे की सुरक्षा, उसकी संगति और उसके भविष्य को लेकर सिंगल मदर्स लगातार चिंतित रहती हैं। समाज में मौजूद असमानताएँ और असुरक्षा की भावना उनके तनाव को और बढ़ा देती है।
हालाँकि इन सभी चुनौतियों के बावजूद सिंगल मदर्स अपने साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति से समाज के लिए प्रेरणा बन रही हैं। वे यह सिद्ध कर रही हैं कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, एक महिला अपने बच्चों को बेहतर जीवन दे सकती है। सरकार और समाज को चाहिए कि सिंगल मदर्स के लिए आर्थिक सहायता, रोजगार के अवसर, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ और सामाजिक सहयोग उपलब्ध कराए।
अंत में यही कहा जा सकता है कि सिंगल पैरेंटिंग महिलाओं के लिए एक कठिन लेकिन सम्मानजनक भूमिका है। उन्हें सहानुभूति नहीं, बल्कि सम्मान, समर्थन और समान अवसर की आवश्यकता है। जब समाज सिंगल मदर्स को स्वीकार करेगा और उनका सहयोग करेगा, तभी एक सशक्त और संवेदनशील समाज का निर्माण संभव हो पाएगा।
