भारतीय संस्कृति विश्वविद्यालय ने देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। विश्वविद्यालय ने भारतीय संगीत एवं नृत्य परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से देशभर में 100 विशेष कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय, लोक और समकालीन संगीत व नृत्य की विविध विधाओं को मंच प्रदान किया जाएगा, ताकि युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सके।
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, यह पहल केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका उद्देश्य भारतीय संगीत और नृत्य परंपराओं के मूल स्वरूप, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक महत्व को भी समझाना है। कार्यक्रमों के माध्यम से यह बताया जाएगा कि भारतीय कलाएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन दर्शन, अनुशासन और संवेदनशीलता का प्रतिबिंब हैं।
इन आयोजनों में हिंदुस्तानी और कर्नाटक शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत की विभिन्न शैलियाँ, भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कुचिपुड़ी, मणिपुरी जैसे शास्त्रीय नृत्य रूपों के साथ-साथ क्षेत्रीय लोक नृत्य और समकालीन प्रस्तुतियाँ भी शामिल होंगी। इसके अलावा वाद्य संगीत, गायन परंपराएँ और गुरु-शिष्य परंपरा की भूमिका को भी विशेष रूप से रेखांकित किया जाएगा।
कार्यक्रमों की रूपरेखा को इस तरह तैयार किया गया है कि इसमें विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, कलाकारों और समाज के विभिन्न वर्गों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो सके। विश्वविद्यालय का मानना है कि जब शिक्षा संस्थान सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बनते हैं, तो युवाओं में अपनी परंपराओं के प्रति सम्मान और गर्व की भावना स्वतः विकसित होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय संगीत और नृत्य हमारी सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। ये कलाएँ पीढ़ियों से सामाजिक मूल्यों, भावनाओं और आध्यात्मिक चेतना को व्यक्त करने का माध्यम रही हैं। ऐसे आयोजनों से न केवल पारंपरिक कलाओं को नई ऊर्जा मिलती है, बल्कि उन कलाओं को भी पुनर्जीवित करने का अवसर मिलता है, जो समय के साथ हाशिये पर चली गई हैं।
कार्यक्रमों की श्रृंखला पूरे वर्ष चलने की योजना के तहत बनाई गई है। इसमें मंचीय प्रस्तुतियों के साथ-साथ कार्यशालाएँ, प्रशिक्षण शिविर, संवाद सत्र और इंटरैक्टिव सेमिनार भी आयोजित किए जाएंगे। विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए ऐसे सत्र रखे जाएंगे, जिनमें उन्हें भारतीय संगीत और नृत्य की बारीकियों, रागों, तालों, भाव-भंगिमाओं और तकनीकी पक्षों से परिचित कराया जाएगा।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि इन कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को केवल दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी बनाया जाएगा। उन्हें कलाकारों से सीधे संवाद करने, प्रश्न पूछने और सीखने का अवसर मिलेगा। इससे कला के प्रति उनकी समझ और रुचि दोनों में वृद्धि होगी।
आज के डिजिटल युग में, जहाँ मनोरंजन के साधन तेजी से बदल रहे हैं, पारंपरिक कलाओं के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं। ऐसे समय में इस तरह की पहल भारतीय संगीत और नृत्य को समकालीन संदर्भों में प्रासंगिक बनाए रखने में सहायक होगी। विश्वविद्यालय का प्रयास है कि परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु स्थापित किया जाए, ताकि संस्कृति जीवंत बनी रहे।
विश्वविद्यालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन 100 कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने का प्रयास किया जाएगा। भविष्य में इन आयोजनों से जुड़े चयनित कार्यक्रमों को अंतरराष्ट्रीय मंचों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी प्रस्तुत करने की योजना है, जिससे भारतीय कला और संस्कृति की पहुंच वैश्विक दर्शकों तक हो सके।
शिक्षा और संस्कृति के इस संगम को विश्वविद्यालय एक दीर्घकालिक अभियान के रूप में देख रहा है। प्रशासन का मानना है कि जब युवा पीढ़ी अपनी जड़ों को समझती है, तभी वह आत्मविश्वास के साथ भविष्य की ओर बढ़ती है। भारतीय संगीत और नृत्य परंपराओं को संजोने की यह पहल न केवल सांस्कृतिक संरक्षण का प्रयास है, बल्कि समाज को अपनी विरासत से जोड़ने की एक सार्थक कोशिश भी मानी जा रही है।
