अक्सर हम अपने सपनों को हालात, ज़िम्मेदारियों और समाज की उम्मीदों के नीचे दबा देते हैं। बचपन में जिन सपनों ने हमें उत्साहित किया था, वही धीरे-धीरे “व्यावहारिक नहीं है” कहकर किनारे रख दिए जाते हैं। लेकिन सच यह है कि सपने सिर्फ़ देखने के लिए नहीं होते, वे हमें ज़िंदा महसूस कराने के लिए होते हैं।

सपनों को दबाने की आदत धीरे-धीरे मन में खालीपन भर देती है। बाहर से ज़िंदगी ठीक चलती दिखती है, लेकिन भीतर कुछ अधूरा रह जाता है। यह अधूरापन थकान, चिड़चिड़ेपन और आत्मसंतोष की कमी में बदल सकता है। कई लोग इसे समझ ही नहीं पाते, और इसी हालत को अपनी नियति मान लेते हैं।
अपने सपनों को चुनिए
सपनों को जीने की शुरुआत बहुत बड़ी नहीं होती। इसके लिए नौकरी छोड़ना या सब कुछ बदल देना ज़रूरी नहीं है। ज़रूरी है अपने सपने को पहचानना और उसके लिए रोज़ थोड़ा-सा समय निकालना। चाहे वह लिखना हो, पढ़ना, सीखना, सिखाना या कोई नया हुनर—छोटे कदम ही बड़े बदलाव की नींव बनते हैं।

सबसे बड़ी रुकावट अक्सर डर होता है—असफल होने का डर, लोगों की राय का डर, और देर हो जाने का डर। लेकिन हर सपना तब मरता है जब हम डर को खुद से बड़ा मान लेते हैं। याद रखिए, देर कभी नहीं होती, देर सिर्फ़ तब होती है जब हम कोशिश ही न करें।
सपनों को जीने का मतलब यह भी है कि खुद को चुनना सीखें। हर समय दूसरों को खुश करते-करते खुद को भूल जाना आसान है, लेकिन लंबे समय में यही सबसे बड़ा नुकसान होता है। जब आप अपने सपनों के साथ ईमानदार होती हैं, तो आप न सिर्फ़ खुद को, बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी प्रेरित करती हैं।

सपने कोई बोझ नहीं होते। वे आपकी पहचान, आपकी ऊर्जा और आपकी संभावना होते हैं। उन्हें दबाइए मत, उन्हें जगह दीजिए। धीरे चलिए, लेकिन रुकिए मत—क्योंकि जब आप अपने सपनों को जीना सीख लेती हैं, तभी ज़िंदगी सच में आपकी बनती है।
