भारत में एक समय ऐसा था, जब लड़कियों के लिए सपनों की भी एक सीमा तय कर दी जाती थी। पढ़ाई ज़रूरी मानी जाती थी, लेकिन केवल वहीं तक जहाँ वह घर और परिवार तक सीमित रहे। इंजीनियरिंग, तकनीक और निर्माण जैसे क्षेत्र महिलाओं के लिए “अनुपयुक्त” समझे जाते थे।
इसी दौर में एक महिला ने न केवल इस सोच को चुनौती दी, बल्कि अपने काम से यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मज़बूत हों, तो कोई भी सीमा स्थायी नहीं होती।
यह महिला थीं — शकुंतला भगत, भारत की पहली महिला सिविल इंजीनियर।
बचपन से ही अलग सोच
6 फरवरी 1933 को मुंबई में जन्मी शकुंतला भगत बचपन से ही पढ़ाई में तेज़ थीं। उन्हें गणित और संरचनाओं में गहरी रुचि थी। जब अधिकतर लोग यह मानते थे कि लड़कियाँ विज्ञान और इंजीनियरिंग में आगे नहीं बढ़ सकतीं, तब शकुंतला ने इन्हीं विषयों को अपना भविष्य बनाने का फैसला किया।
यह फैसला आसान नहीं था। सामाजिक दबाव, सीमित अवसर और पुरुष-प्रधान माहौल — सब उनके सामने थे। लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी काबिलियत पर भरोसा किया।
भारत की पहली महिला सिविल इंजीनियर
1953 में शकुंतला भगत ने मुंबई के वीरमाता जीजाबाई टेक्नोलॉजिकल इंस्टीट्यूट (VJTI) से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। यह सिर्फ एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारतीय इतिहास में एक नया अध्याय था।
वह भारत की पहली महिला सिविल इंजीनियर बनीं — एक ऐसा मुकाम, जो उस दौर में किसी महिला के लिए अकल्पनीय माना जाता था।
ज्ञान की तलाश और देश के लिए समर्पण
अपनी पढ़ाई को और आगे बढ़ाते हुए शकुंतला भगत अमेरिका गईं और यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर्स किया।
विदेश में अवसरों की कमी नहीं थी, लेकिन उन्होंने भारत लौटने का फैसला किया। उनका मानना था कि जो ज्ञान उन्होंने पाया है, उसका उपयोग देश के विकास के लिए होना चाहिए।
शिक्षा से नवाचार तक
भारत लौटकर उन्होंने IIT बॉम्बे में अध्यापन कार्य किया। एक शिक्षिका के रूप में वह छात्रों को केवल किताबों का ज्ञान नहीं देती थीं, बल्कि यह भी सिखाती थीं कि इंजीनियरिंग का असली उद्देश्य लोगों के जीवन को आसान बनाना है।
यहीं से उनके भीतर नवाचार की भावना और मजबूत हुई।
पुलों से जुड़ा भारत
अपने पति इंजीनियर अनिरुद्ध भगत के साथ मिलकर उन्होंने Quadricon Pvt. Ltd. की स्थापना की। इस कंपनी के माध्यम से उन्होंने मॉड्यूलर ब्रिज सिस्टम विकसित किया — ऐसे पुल, जो कम समय में, कम लागत में और दुर्गम इलाकों में भी बनाए जा सकते थे।
शकुंतला भगत ने अपने करियर में 200 से अधिक पुलों की डिजाइन तैयार की।
ये पुल केवल लोहे और स्टील की संरचनाएँ नहीं थे —
इन्होंने पहाड़ों को मैदानों से जोड़ा,
गांवों को शहरों से जोड़ा,
और लोगों को बेहतर जीवन से जोड़ा।
हिमालय, लद्दाख, कश्मीर और उत्तर-पूर्व भारत जैसे कठिन क्षेत्रों में उनके डिज़ाइन किए पुल आज भी खड़े हैं और उनकी सोच की गवाही देते हैं।
सम्मान और सादगी
उनके योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले, जिनमें Invention Promotion Board Award और Woman Engineer of the Year जैसे पुरस्कार शामिल हैं।
इसके बावजूद, वह हमेशा सादगी में रहीं और प्रचार से दूर रहीं। उनके लिए काम ही पहचान था।
एक प्रेरक विरासत
14 अक्टूबर 2012 को शकुंतला भगत का निधन हो गया, लेकिन उनका योगदान आज भी जीवित है। उनकी बनाई संरचनाएँ, उनके विचार और उनकी हिम्मत आज की पीढ़ी को लगातार प्रेरित कर रही है।
आज की महिलाओं के लिए संदेश
शकुंतला भगत की कहानी हमें यह सिखाती है कि
महिलाओं की क्षमता को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता।
अगर अवसर न भी हों, तो मेहनत और आत्मविश्वास नए रास्ते बना सकते हैं।
आज जब STEM और इंजीनियरिंग में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, तो यह याद रखना ज़रूरी है कि यह राह दशकों पहले शकुंतला भगत जैसी महिलाओं ने बनाई थी।
वह सिर्फ पुल बनाने वाली इंजीनियर नहीं थीं,
वह सोच, साहस और समानता के बीच एक मज़बूत सेतु थीं
