करीब 14 साल पहले गंगा मां की जिंदगी एक ऐसे मोड़ पर थी, जहां उन्हें अपने निजी संघर्षों के साथ-साथ अपने बच्चों की जिम्मेदारी भी अकेले संभालनी पड़ी। वैवाहिक जीवन में परेशानियों के बाद जब उनका परिवार बिखरा, तब उनके सामने नई जिंदगी शुरू करने की बड़ी चुनौती थी। उस समय शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि आने वाले सालों में उनका जीवन सैकड़ों बेजुबान जानवरों की देखभाल से जुड़ जाएगा।
उनकी जिंदगी में बदलाव की शुरुआत एक बेहद छोटी, लेकिन भावुक घटना से हुई। एक दिन उनकी छत से एक नन्ही बिल्ली नीचे गिर गई। गंगा मां ने उसे देखा और उसकी जान बचाने के लिए तुरंत आगे आईं। उन्होंने उस बिल्ली की देखभाल की। उनके बच्चों का भी उस नन्ही बिल्ली से गहरा लगाव हो गया। हालांकि कुछ समय बाद वह बिल्ली उनके साथ नहीं रही, लेकिन उसके साथ जुड़ी याद ने परिवार के मन में बेजुबान जानवरों के लिए एक अलग तरह की संवेदना पैदा कर दी।
इसके बाद धीरे-धीरे गंगा मां की जिंदगी में आवारा जानवर आने लगे। सबसे पहले एक कुत्ता उनके संपर्क में आया। फिर दूसरा और उसके बाद जरूरतमंद जानवरों की संख्या बढ़ती चली गई। किसी को चोट लगी थी, कोई बीमार था तो कोई भूख और अकेलेपन से जूझ रहा था। गंगा मां ने इन्हें सिर्फ सड़क पर घूमने वाले जानवर समझकर नजरअंदाज नहीं किया, बल्कि उनकी जरूरत को समझकर उनकी जिम्मेदारी उठानी शुरू कर दी।
शुरुआत में उनके लिए यह सब आसान नहीं था। खुद अपनी जिंदगी को संभालते हुए इतने जानवरों की देखभाल करना बड़ी चुनौती थी। खाने का इंतजाम, बीमार जानवरों की देखभाल और उनके लिए सुरक्षित जगह उपलब्ध कराना हर काम में समय, मेहनत और संसाधनों की जरूरत होती थी। लेकिन गंगा मां का लगाव धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि इन जानवरों की जरूरतें उनकी अपनी जिंदगी का हिस्सा बन गईं।
उनके लिए पशु सेवा सिर्फ दया दिखाने तक सीमित नहीं रही। किसी जानवर को चोट लगी तो उसकी देखभाल करना, भूखे जानवर को खाना देना और बेसहारा जानवर को सुरक्षित जगह देना उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन गया। जिन बेजुबानों को अक्सर लोग सड़क पर देखकर आगे बढ़ जाते हैं, उनके लिए गंगा मां रुकती हैं और उनकी मदद करने की कोशिश करती हैं।
इस सफर में उनके बच्चों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। जिस छोटी सी बिल्ली ने कभी उनके परिवार के दिल में जानवरों के लिए प्यार जगाया था, उसकी याद जैसे उनके पूरे जीवन की सोच का हिस्सा बन गई। धीरे-धीरे उनका घर और उनका परिवार इन बेजुबानों के लिए भी एक सहारे की जगह बनता चला गया।
गंगा मां की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के कठिन दौर को सिर्फ अपने दर्द तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने उस दर्द और अकेलेपन को संवेदना में बदला और ऐसी जिंदगी चुनी, जिसमें दूसरों के लिए जगह थी—चाहे वे इंसान हों या बेजुबान जानवर।
आज उनका सफर हमें यह याद दिलाता है कि किसी जानवर की मदद करने के लिए हमेशा बहुत कुछ होना जरूरी नहीं है। कई बार एक कटोरी खाना, इलाज के लिए उठाया गया एक कदम या किसी घायल जानवर को सुरक्षित जगह पहुंचाना भी उसके लिए पूरी दुनिया बदल सकता है।
