भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से प्रणाम करने की परंपरा चली आ रही है। वहीं शास्त्रों में दंडवत प्रणाम का महत्व बताया गया है। माना जाता है कि एक दंडवत प्रणाम से एक यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। वहीं हिंदू धर्म में षोडशोपचार पूजन यानि सोलह वस्तुओं से ईश्वर की स्तुति की जाती है, जिसमें दंडवत प्रणाम को स्तुति का आखिरी चरण बताया गया है। आमतौर पर लोग मंदिरों और तीर्थ स्थानों या अपने पूजा स्थान पर साष्टांग प्रणाम या दंडवत प्रणाम करते हैं लेकिन हिंदू धर्म के अनुसार, महिलाओं को दंडवत प्रणाम करना निषेध होता है, आइये जानते हैं क्यों महिलाओं का दंडवत प्रणाम करना अनुचित बताया गया है।
महिलाएं है देवी रूप और पूजनीय
माना जाता है कि महिलाएं अपने पेट में एक जीवन को पालती हैं और अपने वक्षस्थल से उस जीवन का पोषण करती हैं। इसी कारण महिलाएं देवी रूप हैं और पूजनीय हैं, इसलिए महिलाओं को अपने ये दोनों अंगों को जमीन से स्पर्श नहीं करना चाहिए।
यदि कई महिला ऐसा करती है तो धरती उसका वजन उठा नहीं पाती है और इस तरह से दंडवत प्रणाम करने वाली महिला से उसकी अष्टलक्ष्मी छीन लेती है। धार्मिक शास्त्रों में बताया गया है कि महिलाओं को किसी आसन पर अपने घुटनों के बल बैठकर मंदिर में प्रणाम करना चाहिए, इससे पूजा का सही फल मिलता है।
ग्रंथों में मिलता है उल्लेख
“ब्राह्मणस्य गुदं शंखं शालिग्रामं च पुस्तकम्. वसुन्धरा न सहते कामिनी कुच मर्दनं.” ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि ब्राह्मण का पिछला हिस्सा, शंख, शालिग्राम और धार्मिक पुस्तकों को सीधे धरती से स्पर्श नहीं कराना चाहिए और महिलाओं को भी जमीन पर अपने पेट और वक्षस्थल के सहारे दंडवत प्रणाम नहीं करना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण का पिछला हिस्सा, शंख, शालिग्राम और धार्मिक पुस्तकों को सीधे धरती से स्पर्श नहीं कराना चाहिए और साथ ही महिलाओं को भी जमीन पर अपने पेट और वक्षस्थल के सहारे दंडवत प्रणाम नहीं करना चाहिए।
