आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया और स्क्रीन हर जगह हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन गए हैं। बच्चे भी इस दुनिया में बड़े हो रहे हैं, जहां उनकी जिज्ञासा और सीखने की क्षमता लगातार डिजिटल सामग्री से प्रभावित हो रही है। यही कारण है कि बच्चों का स्क्रीन के प्रति रिश्ता कई बार अस्वस्थ रूप ले लेता है। ऐसे में बच्चों की डिजिटल आदतों को नियंत्रित करना माता-पिता के लिए एक चुनौती बन गया है। इस संदर्भ में बॉलीवुड अभिनेत्री और लेखक सोहा अली खान ने अपने अनुभव साझा किए हैं और बताया कि कैसे उन्होंने अपनी बेटी इनाया की स्क्रीन डिपेंडेंसी को कम किया।
सोहा ने इंडिया टुडे के “Anything But” सेगमेंट में 25 अक्टूबर को Parenting Tips पर चर्चा करते हुए कहा, “आज के बच्चे डिजिटल दुनिया में जन्म लेते हैं और इसमें उनकी जिज्ञासा बहुत बढ़ जाती है। बच्चे हर चीज़ जानने और महसूस करने के लिए उत्सुक रहते हैं। हमें उनके साथ संवाद बनाए रखना चाहिए और उन्हें समझना चाहिए।”
सोहा ने बताया कि अक्सर बच्चे चिड़चिड़े या बेचैन होने पर स्क्रीन की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसा करना शुरुआती तौर पर आसान लगता है, क्योंकि इससे बच्चे शांत हो जाते हैं और ध्यान भटक जाता है। लेकिन लंबे समय में यह उनकी स्क्रीन डिपेंडेंसी को बढ़ाता है और उनका डिजिटल रिश्ता अस्वस्थ बनाता है।
सोहा ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, “हमारे लिए इनाया की परवरिश में सबसे बड़ा सकारात्मक बदलाव तब आया जब हमने परिवार में पालतू जानवर को शामिल किया। इससे इनाया को सहानुभूति, जिम्मेदारी और असली दुनिया के अनुभव मिले, जो स्क्रीन या डिजिटल डिवाइस कभी नहीं दे सकते।” पालतू जानवर बच्चों में संवेदनशीलता और समझदारी विकसित करने का एक अनोखा तरीका हैं।
सोहा की पेरेंटिंग फिलॉसफी बच्चों की जिज्ञासा को सम्मान देने और उन्हें संवाद का अवसर देने पर आधारित है। उन्होंने कहा, “मैं चाहती थी कि इनाया हमेशा सिर्फ सुनी न जाए, बल्कि उसके विचारों और सवालों को भी सुना जाए। परिवार में बच्चे को अपनी बात कहने और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए।”
सोहा ने बताया कि उनका पेरेंटिंग स्टाइल साइकिल-ब्रेकिंग पेरेंटिंग पर आधारित है। इसका मतलब है कि पारंपरिक घरों में जहां बच्चों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है, सोहा ऐसा नहीं करतीं। वे अपने बच्चे को सक्रिय रूप से संवाद में शामिल करती हैं और उनके व्यक्तित्व को बढ़ने का मौका देती हैं।
हालांकि संवाद खुला होता है, सोहा यह भी बताती हैं कि सीमाओं का होना जरूरी है। “जेंटल पेरेंटिंग का मतलब यह नहीं कि बच्चे को सब कुछ करने दिया जाए। इसका मतलब है कि बच्चे सुरक्षित और सुने हुए महसूस करें, लेकिन अनुशासन का पालन भी हो।”
सोहा का यह अनुभव यह दर्शाता है कि बच्चों में सहानुभूति और आत्म-नियंत्रण विकसित करने के लिए डिजिटल दुनिया के साथ संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। पालतू जानवर, खुला संवाद और सीमित स्क्रीन टाइम बच्चों की मानसिक और भावनात्मक परवरिश में मदद कर सकते हैं।
इस पेरेंटिंग दृष्टिकोण से बच्चों में अधिक संवेदनशीलता, समझदारी और जिम्मेदारी विकसित होती है। सोहा की यह सलाह अन्य माता-पिता के लिए भी एक प्रेरणा हो सकती है कि कैसे डिजिटल युग में बच्चों को संतुलित और खुशहाल तरीके से बड़ा किया जा सकता है।
नोट: यह लेख केवल सूचना के उद्देश्य से है। किसी भी चिकित्सा या मनोवैज्ञानिक मामले के लिए योग्य पेशेवर की सलाह अवश्य लें।
