एक समय था जब काम और घर के बीच साफ़ दीवारें थीं—ऑफिस मतलब करियर और घर मतलब परिवार। लेकिन वर्क-फ्रॉम-होम ने इन दीवारों को गिरा दिया है, खासकर कामकाजी माँओं के लिए। आज की माँ लैपटॉप के सामने बैठकर मीटिंग भी अटेंड कर रही है और साथ ही बच्चे की ऑनलाइन क्लास, होमवर्क, खाने और भावनाओं की ज़िम्मेदारी भी निभा रही है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या वर्क-फ्रॉम-होम सच में कामकाजी माँ के लिए वरदान है या एक नई चुनौती?

वर्क-फ्रॉम-होम: एक राहत भरा अवसर
कई माँओं के लिए घर से काम करना किसी वरदान से कम नहीं है। रोज़ के लंबे सफ़र से छुटकारा, बच्चों के पास रहने का सुकून और समय पर घर के काम निपटा पाने की सुविधा—ये सब वर्क-फ्रॉम-होम के बड़े फ़ायदे हैं। एक माँ जब अपने बच्चे को स्कूल के लिए तैयार करते हुए भी काम कर पाती है, या बीमार बच्चे के पास रहकर ऑफिस की ज़िम्मेदारियाँ निभा लेती है, तो उसे लगता है कि वह दोनों दुनिया को साथ संभाल पा रही है।
इसके अलावा, कई महिलाएँ जो माँ बनने के बाद नौकरी छोड़ने को मजबूर हो गई थीं, उन्हें वर्क-फ्रॉम-होम ने दोबारा करियर से जुड़ने का मौका दिया है। फ्रीलांसिंग, ऑनलाइन जॉब्स और रिमोट वर्क ने माँओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता का नया रास्ता दिखाया है।
लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं

वर्क-फ्रॉम-होम जितना बाहर से आसान लगता है, अंदर से उतना ही थकाने वाला भी हो सकता है। घर में रहते हुए काम करने पर अक्सर यह उम्मीद की जाती है कि माँ “हमेशा उपलब्ध” रहे—बच्चों के लिए भी और ऑफिस के लिए भी।
ऑफिस टाइम और पर्सनल टाइम का फर्क धीरे-धीरे मिटने लगता है। कभी मीटिंग के बीच बच्चे की आवाज़, तो कभी काम के बीच रसोई की ज़िम्मेदारी—माँ लगातार मल्टीटास्किंग करती रहती है, जिसका असर उसकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर पड़ता है।
सबसे बड़ी चुनौती है गिल्ट—अगर काम पर ध्यान दिया तो लगेगा बच्चों को समय नहीं दिया, और अगर बच्चों के साथ रहीं तो करियर से समझौता करने का डर सताता है।
समाज की सोच और माँ पर दबाव

वर्क-फ्रॉम-होम करने वाली माँओं को अक्सर यह सुनने को मिलता है—“घर पर ही तो हो, थोड़ा और संभाल लो।” यह सोच माँ की मेहनत को कम आँकती है। घर से काम करने का मतलब यह नहीं कि काम कम है, बल्कि कई बार यह ज़्यादा हो जाता है।
एक कामकाजी माँ सिर्फ़ कर्मचारी नहीं होती, वह घर की भावनात्मक धुरी भी होती है—और यही दोहरी भूमिका उसे सबसे ज़्यादा थका देती है।
संतुलन ही असली कुंजी
वर्क-फ्रॉम-होम को वरदान या चुनौती बनाने वाली चीज़ है—संतुलन। अगर काम के लिए तय समय हो, परिवार का सहयोग मिले और माँ खुद के लिए भी थोड़ा समय निकाले, तो यह व्यवस्था बेहद असरदार हो सकती है।
माँ का खुश और संतुलित रहना बच्चों के लिए भी ज़रूरी है। जब एक माँ अपने करियर को सम्मान देती है, तो वह बच्चों को यह सिखाती है कि सपने छोड़ना नहीं, निभाना चाहिए।
