हर बच्चा अलग है, फिर एक ही पैमाने पर क्यों?“देखो, तुम्हारी बहन ने कितने अच्छे नंबर लाए हैं।”“शर्मा जी का बेटा तो तुमसे छोटा है, फिर भी कितना आगे है।““तुम्हारी दोस्त कितनी एक्टिव है और तुम हमेशा चुप रहते हो।”
बच्चों से कही गई ये बातें अक्सर माता-पिता के लिए सामान्य लग सकती हैं, लेकिन बच्चे के मन में इनका असर काफी गहरा हो सकता है। हर बच्चा अपनी अलग क्षमता, रुचि और गति के साथ बड़ा होता है। फिर भी पढ़ाई, खेल, व्यवहार, दिखावे या उपलब्धियों के आधार पर उसकी तुलना किसी दूसरे बच्चे से करना आम बात है।
तुलना की शुरुआत कहां से होती है?
कई बार माता-पिता तुलना इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे बच्चा प्रेरित होगा। उन्हें लगता है कि किसी दूसरे बच्चे का उदाहरण देने से उनका बच्चा भी मेहनत करेगा। कभी-कभी परिवार और समाज का दबाव भी इसका कारण बनता है। रिश्तेदारों के सवाल, स्कूल का प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर दिखती बच्चों की उपलब्धियां माता-पिता की अपेक्षाओं को बढ़ा सकती हैं।
लेकिन प्रेरित करने और तुलना करने में फर्क है। “तुम पिछली बार से बेहतर कर सकते हो” बच्चे को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकता है, जबकि “देखो, वह तुमसे बेहतर है” उसका ध्यान अपनी क्षमता से हटाकर दूसरे बच्चे पर लगा देता है।
हर बच्चा अपनी रफ्तार से सीखता है
कोई बच्चा पढ़ाई में अच्छा हो सकता है, तो कोई खेल, संगीत, कला, डांस या बातचीत में। कुछ बच्चे जल्दी घुल-मिल जाते हैं, जबकि कुछ को समय लगता है। किसी बच्चे को किसी काम को समझने में दस मिनट लगते हैं, तो दूसरे को वही चीज समझने में ज्यादा समय लग सकता है।
इस अंतर का मतलब यह नहीं कि कोई बच्चा कम सक्षम है। विकास की अपनी गति होती है और बच्चे की क्षमता को केवल अंकों या उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता।
तुलना बच्चे को क्या महसूस करा सकती है?
बार-बार तुलना होने पर बच्चा यह मानने लग सकता है कि उसका मूल्य उसकी उपलब्धियों पर निर्भर है। वह गलती करने से डर सकता है, अपनी बात कहने में झिझक सकता है या हर काम में खुद को दूसरे से कम समझने लग सकता है।
भाई-बहनों के बीच लगातार तुलना होने पर उनके बीच प्रतिस्पर्धा और नाराजगी भी बढ़ सकती है। वहीं कुछ बच्चे तुलना के दबाव में अपनी रुचियों से दूर होकर केवल दूसरों को पीछे छोड़ने पर ध्यान देने लगते हैं।
तुलना की जगह प्रगति पर ध्यान दें
बच्चे को किसी दूसरे से बेहतर बनाने के बजाय उसकी अपनी पिछली स्थिति से तुलना करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है। “पिछली बार से तुम्हारी लिखावट कितनी अच्छी हुई है” या “तुमने इस बार पहले से ज्यादा कोशिश की” जैसी बातें बच्चे के प्रयास को पहचानती हैं।
गलती होने पर भी केवल परिणाम पर ध्यान देने के बजाय यह पूछना बेहतर है कि उसे किस जगह परेशानी हुई और अगली बार क्या अलग किया जा सकता है।
बच्चे को सुनना भी जरूरी है
कभी-कभी बच्चा पढ़ाई या किसी गतिविधि में पीछे इसलिए नहीं होता कि वह मेहनत नहीं करना चाहता। हो सकता है उसे विषय समझने में परेशानी हो, किसी चीज में रुचि न हो या वह किसी और क्षेत्र में बेहतर कर रहा हो। इसलिए तुलना करने से पहले बच्चे को सुनना जरूरी है।
माता-पिता का काम हर बच्चे को किसी तय पैमाने में फिट करना नहीं, बल्कि उसकी ताकत पहचानने और कमजोरियों पर धीरे-धीरे काम करने में उसका साथ देना है।
क्योंकि हर बच्चे की कहानी अलग है
बच्चों की परवरिश कोई प्रतियोगिता नहीं है। हर बच्चा अपने अनुभवों, रुचियों और क्षमताओं के साथ अपनी अलग कहानी लिखता है। इसलिए अगली बार जब मन करे कि बच्चे को किसी और का उदाहरण देकर समझाया जाए, तो एक पल रुककर उसकी अपनी प्रगति देखिए।
क्योंकि बच्चे को यह सुनने की जरूरत नहीं कि वह किसी और जितना अच्छा है। उसे यह महसूस होने की जरूरत है कि वह जैसा है, उसे समझा और स्वीकार किया जा रहा है और वह हर दिन थोड़ा बेहतर कर सकता है।
